नई छहढाला
ढाल - 1, Class - 15
ढाल - 1, Class - 15
नित्य इतर दो भेद निगोद सब ही पूर्ण अपूर्ण विबोध।
श्वास अठारह भाग ही जीते लब्धि अपर्याप्तक सुख रीते॥4॥
जन्म मरण जो होय निरंतर, कहें क्षुद्र भव संज्ञा जिनवर।
छयासठ सहस इक सौ बत्तीस एकेंद्रिय के भव जिन दीस॥5॥