ढाल - 2, Class - 64
जब श्रमण होय निज ध्यान लीन, तब आत्म रुची प्रगटे प्रवीण।
परद्रव्य भिन्न निज आत्मज्ञान, सो ही निश्चय अनुभूति ज्ञान ॥१७॥