नई छहढाला
रचयिता : मुनि श्री प्रणम्य सागर जी
मंगलाचरण
(दोहा)
तीन लोक में चार हैं, मंगल शरण व श्रेष्ठ।
अर्हत सिद्ध व साधुगण, धर्म जैन जगज्येष्ठ ॥१॥
तीर्थंकर जिनदेव की जिनवाणी को ध्याय।
सार्व धर्म संक्षेप से कहूँ चित्त हुलसाय ॥२॥
प्रथम ढाल
(तर्ज- शान्तिनाथ मुख शशि उनहारी...)
चदुगति में हैंजीव अनन्त पंच परावर्तन नहिं अन्त।
तीन लोक में अति घन भरे ज्यों डिबिया काजल को धरे॥१॥
बादर सूक्ष्म भेद से जीव दो विध एकेन्द्रिय जानीव।
पृथ्वी जल अग्नि अरु वायु तथा वनस्पति थावर गाउ॥२॥
साधारण प्रत्येक हु दोय तिन निगोद साधारण होय।
साधारण आहार शरीर एक संग जनि मरणन पीर॥३॥
नित्य इतर दो भेद निगोद सब ही पूर्ण अपूर्ण विबोध।
श्वास अठारह भाग हि जीते लब्धि अपर्याप्तक सुख रीते॥४॥
जन्म मरण जो होय निरन्तर कहें क्षुद्र भव संज्ञा जिनवर।
छ्यासठ सहस इक सौ बत्तीस एकेन्द्रिय के भव जिन दीस॥५॥
सिद्ध जीव से गुणे अनन्त तन निगोद इक जीव वसन्त।
हीरा दुर्लभ बालु समुद्र त्यों दुर्लभ त्रसता है भद्र॥६॥
बे ते चउ इन्द्रिय जे जीव विकलेन्द्रिय शंखादि अतीव।
अस्सी साठ और चालीस तिन में क्षुद्रक भव जिन दीस॥७॥
तातें पंचेन्द्रिय पर्याय दुर्लभ गुण कृतज्ञ ज्यों आय।
पंचेन्द्रिय के हैं चौबीस क्षुद्रक भव कहते जिन ईश॥८॥
छासठ सहस त्रि शत छत्तीस सब अन्तरमुहुुरत भव दीस।
रत्नराशि चौपात मिले ज्यों मनुज जनम दुर्लभ पाना त्यों॥९॥
पुनः मनुज दुर्लभ तरु जले फिर से वे पुद्गल आ मिले।
देश, कुलेन्द्रिय विभव निरोग पुनः पुनः दुष्कर संयोग॥१०॥
गर्भ वास निकसन दुख भूला यौवन मद में रहता फूला।
रोग बुढ़ापा मरणत रोय फिर भी सुख का बीज न बोय॥११॥
धर्म बिना जो जीवन जीव व्यर्थ नेत्र बिन वक्त्र सदीव।
धर्म पाय विषयन में व्यस्त चन्दन दाह भस्म कर मस्त॥१२॥
जस तस विषय विरक्ति होय मरण समाधि सुदुुर्लभ जोय।
इस विध दुर्लभ है संज्ञान बिन विचार पशु मनुज समान॥१३॥
कर्म और नोकर्म अखेद द्रव्य परावर्तन द्वय भेद।
थोड़ा बचा ना कोई द्रव्य भोग न छोड़ा भव्य अभव्य॥१४॥
जन्म मृत्यु से रहित जहान क्षेत्र बचा ना तू यूं जान।
सभी काल के समय अतीव जना मरा है हर इक जीव॥१५॥
प्रति भव की हर एकैं आयु भव परिवर्तन कर दुख पायु।
उत्कट मध्यम जघन विभाव विधि बंधन का वर्तन पाव॥१६॥
ज्यों मदिरा पी और विकार बढ़ता कर्मन का त्यों भार।
यूं परिवर्तन हुए अनन्त कारण कहूँ यथा भगवन्त॥१७॥